Mumbai : बैंकिंग सेक्टर में हलचल: ICICI और HDFC ने बढ़ाया Minimum Balance, ग्राहकों में नाराज़गी
Mumbai। देश के दो सबसे बड़े निजी बैंक—ICICI बैंक और HDFC बैंक—ने अपने नए सेविंग्स अकाउंट के लिए न्यूनतम बैलेंस की आवश्यकता में बड़ा बदलाव कर दिया है, जिससे बैंकिंग सेक्टर में बहस तेज हो गई है। ग्राहकों और सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर नाराज़गी साफ देखी जा रही है।
ICICI बैंक का बड़ा कदम
1 अगस्त से ICICI बैंक ने अर्बन और मेट्रो ग्राहकों के लिए न्यूनतम मासिक औसत बैलेंस को ₹10,000 से बढ़ाकर ₹50,000 कर दिया है। सेमी-अर्बन खाताधारकों के लिए यह ₹25,000 कर दिया गया है, जो पहले ₹5,000 था। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अब ₹10,000 की अनिवार्यता तय की गई है।
HDFC बैंक भी पीछे नहीं
HDFC बैंक ने भी अर्बन सेविंग्स अकाउंट धारकों के लिए न्यूनतम बैलेंस ₹10,000 से बढ़ाकर ₹25,000 कर दिया है। हालांकि, यह बदलाव केवल नए खातों पर लागू होगा, मौजूदा ग्राहकों पर इसका असर नहीं होगा।
सरकारी बैंकों का उल्टा रुख
जहां निजी बैंक न्यूनतम बैलेंस की सीमा बढ़ा रहे हैं, वहीं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक विपरीत दिशा में कदम उठा रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक (SBI), पंजाब नेशनल बैंक, केनरा बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और इंडियन बैंक ने न्यूनतम बैलेंस पर लगने वाली पेनल्टी पूरी तरह समाप्त कर दी है, ताकि वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिल सके।
RBI का बयान
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया कि न्यूनतम बैलेंस तय करने का मुद्दा बैंकों के अधिकार क्षेत्र में आता है। “कुछ बैंकों ने ₹10,000, कुछ ने ₹2,000, तो कुछ ने शून्य न्यूनतम बैलेंस की सीमा रखी है,” उन्होंने कहा।
सोशल मीडिया पर आलोचना
ICICI और HDFC के इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर नाराज़गी तेज है। कई यूज़र्स ने इसे “एलीटिस्ट” और “भेदभावपूर्ण” करार दिया। कारोबारी जय कोटक ने ट्वीट किया, “भारत के 90% लोगों की मासिक आय ₹25,000 से कम है, तो ₹50,000 बैलेंस रखना संभव नहीं।”
सिविल सोसाइटी का विरोध
‘बैंक बचाओ देश बचाओ मंच’ नामक संगठन ने वित्त मंत्रालय को पत्र लिखकर ICICI की नई पॉलिसी को अनुचित और पिछड़ी सोच वाला बताया। बैंकबाज़ार डॉट कॉम के CEO अधिल शेट्टी ने कहा कि यह निजी बैंकों की प्रीमियम ग्राहक रणनीति है और आगे शायद इसके साथ नई सेवाएं भी जुड़ें।
जुर्माना और असर
जो नए ग्राहक न्यूनतम बैलेंस नहीं रख पाएंगे, उनसे 6% की कमी या ₹500-₹600 तक का जुर्माना लिया जाएगा। वित्तीय समावेशन सूचकांक 2025 में 67 तक पहुंच गया है, लेकिन निजी बैंकों की नई नीति इसे चुनौती देती दिख रही है।