Nisha Bhagat Biography आदिवासी समाज के अधिकारों और पहचान के लिए संघर्ष करने वाली निशा भगत की जीवन यात्रा को सामने लाती है। होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई और बेंगलुरु में नौकरी के बाद उन्होंने अपने करियर का रास्ता बदलकर आदिवासी समाज के मुद्दों पर काम करने का निर्णय लिया। उनकी सामाजिक सक्रियता सरना धर्म कोड, पेसा कानून और जल-जंगल-जमीन जैसे विषयों से जुड़ी रही है।
Nisha Bhagat Biography: शिक्षा और करियर से सामाजिक कार्य तक
निशा भगत ने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें बेंगलुरु में नौकरी मिली, जहां वह अपने पेशेवर जीवन को आगे बढ़ा सकती थीं। लेकिन आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों ने उन्हें सामाजिक कार्यों की ओर आकर्षित किया।
उन्होंने नौकरी छोड़कर समाज के बीच रहकर काम करने का फैसला किया। इस निर्णय के पीछे उनके परिवार और पिता हन्दू भगत के संघर्ष की भूमिका भी बताई जाती है। करियर की संभावनाओं के बजाय उन्होंने आदिवासी समाज की संस्कृति, पहचान और अधिकारों से जुड़े सवालों को प्राथमिकता दी।

पिता हन्दू भगत के संघर्ष से मिली प्रेरणा
निशा भगत के पिता हन्दू भगत भी आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए सक्रिय रहे थे। उनके आंदोलनकारी जीवन और परिवार के संघर्ष ने निशा भगत के विचारों को प्रभावित किया। समय के साथ सामाजिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता बढ़ती गई।
आदिवासी पहचान, परंपरा और अधिकारों से संबंधित विषयों पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखनी शुरू की। उनकी पहचान आदिवासी समाज के मुद्दों को मुखरता से उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में बनी।

Nisha Bhagat Biography: सरना धर्म कोड और पेसा कानून पर सक्रियता
निशा भगत सरना धर्म कोड की मांग, पेसा कानून के क्रियान्वयन और जल-जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रही थीं। आदिवासी समाज की अलग धार्मिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों को लेकर उन्होंने आंदोलनों और प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
सरना धर्म कोड की मांग को लेकर राजभवन के समक्ष मुंडन कराकर विरोध जताने का उनका कदम भी चर्चा में रहा। इस माध्यम से उन्होंने आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान और अधिकारों से जुड़े मुद्दों को सार्वजनिक विमर्श में उठाया।

सामाजिक कार्यों से राजनीति तक निशा भगत का सफर
सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहने के बाद निशा भगत ने राजनीति में भी प्रवेश किया। वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने गुमला सीट से झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के टिकट पर चुनाव लड़ा था।
राजनीतिक क्षेत्र में उनकी पहचान आदिवासी समाज के मुद्दों को उठाने वाली मुखर कार्यकर्ता के रूप में बनी। सामाजिक संघर्ष से राजनीति तक की उनकी यात्रा आदिवासी अधिकारों और पहचान से जुड़े सवालों के इर्द-गिर्द रही।

आदिवासी समाज के मुद्दों से जुड़ी रही निशा भगत की पहचान
निशा भगत की जीवन यात्रा में शिक्षा, नौकरी, सामाजिक सक्रियता और राजनीति के अलग-अलग पड़ाव देखने को मिलते हैं। बेंगलुरु में नौकरी से लेकर आदिवासी समाज के बीच काम करने और चुनाव लड़ने तक उन्होंने अपनी गतिविधियों को सामाजिक मुद्दों से जोड़े रखा।
सरना धर्म कोड, पेसा कानून, जल-जंगल-जमीन और आदिवासी पहचान जैसे विषय उनकी सार्वजनिक सक्रियता के प्रमुख केंद्र रहे।
यह भी पढ़ें:





