Kukru News: बांदना परब, सोहराय और काली पूजा की तैयारियों के बीच कुकड़ू के साप्ताहिक हाट में शुक्रवार को खरीदारों की भारी भीड़ उमड़ी। चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के आसपास के गांवों से पहुंचे ग्रामीणों ने पारंपरिक पूजा सामग्री की खरीदारी की। पर्वों के नजदीक आने के साथ ही ग्रामीण बाजारों में रौनक बढ़ गई है।

Kukru News: पारंपरिक पूजा सामग्री की बढ़ी मांग
कुकड़ू हाट में मिट्टी के बर्तन, गुड़, सरसों तेल, बांस से बने सूप और टोकरी, सिंदूर सहित पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की दुकानों पर दिनभर खरीदारों की चहल-पहल रही। विशेष रूप से पारंपरिक सामग्री की मांग अधिक देखने को मिली। बाजार में बढ़ी रौनक से दुकानदार भी उत्साहित नजर आए।

बांदना परब और सोहराय से जुड़ी कृषि परंपरा
बांदना और सोहराय झारखंड की लोकसंस्कृति, कृषि परंपरा और ग्रामीण जीवन से जुड़े प्रमुख पर्व हैं। इनके माध्यम से किसान प्रकृति और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। खेती-किसानी में गाय और बैलों की महत्वपूर्ण भूमिका को ध्यान में रखते हुए इन पर्वों में गोवंश की विशेष पूजा की जाती है। पशुओं को नहलाने, सजाने और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्मान देने की परंपरा निभाई जाती है।

पांच दिनों तक मनाया जाता है बांदना परब
झामुमो के पूर्व कुकड़ू प्रखंड अध्यक्ष इंद्रजीत महतो के अनुसार, बांदना परब पांच दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान गोबरधन पूजा यानी गौहाल पूजा, गाय चुमान और बांदना खूंटा समेत कई पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं।
ग्रामीण अपने गाय-बैलों को सजाते हैं और पारंपरिक लोकगीतों के माध्यम से पर्व की खुशियां मनाते हैं। यह उत्सव पशुधन के प्रति सम्मान और खेती-किसानी में उनके योगदान को याद करने का प्रतीक है।

ग्रामीण समाज में लोकसंस्कृति के प्रति उत्साह बरकरार
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बांदना और सोहराय की परंपराएं उत्साह के साथ निभाई जाती हैं। कुकड़ू साप्ताहिक हाट में उमड़ी भीड़ ग्रामीण समाज की पारंपरिक त्योहारों और लोकसंस्कृति के प्रति आस्था को दर्शाती है। आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद इन पर्वों का महत्व ग्रामीण जीवन में कायम है।
यह भी पढ़ें:






