जेब में 5 लाख का ‘आयुष्मान कार्ड‘, फिर भी अस्पताल की चौखट पर टूटती सांसें: क्या यह सिर्फ कागजों पर इलाज है?
झारखंड के एक जिला अस्पताल के बाहर बैठे रामू (नाम परिवर्तित) की आँखों में गुस्सा और बेबसी दोनों है। उनके हाथ में प्लास्टिक का वह सुनहरा ‘आयुष्मान कार्ड’ है जो 5 लाख रुपये के मुफ्त इलाज की गारंटी देता है, लेकिन अंदर स्ट्रेचर पर उनकी माँ आखिरी सांसें ले रही हैं। डॉक्टर का जवाब रटा-रटाया है— “बेड नहीं है, वेंटिलेटर चलाने वाला कोई नहीं है।” सवाल यह है कि अगर कार्ड है, बजट है और योजना है, तो फिर जान क्यों नहीं बच रही?
43 करोड़ कार्ड, पर क्या अस्पताल तैयार हैं?

फरवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में 43 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी किए जा चुके हैं। सरकार ने बजट 2026-27 में स्वास्थ्य मंत्रालय को 1,06,530 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो पिछले साल से लगभग 10% ज्यादा है। लेकिन चमकते आंकड़ों के पीछे की सच्चाई डरावनी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में (अप्रैल 2026) कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि “सांख्यिकीय दावे (Data) तब तक अर्थहीन हैं जब तक मरीज को समय पर वेंटिलेटर न मिले।”
अस्पतालों के वो ‘बहाने’ जो जान ले लेते हैं
जब एक गरीब मरीज प्राइवेट या बड़े सरकारी अस्पताल पहुँचता है, तो उसे अक्सर इन तीन दीवारों का सामना करना पड़ता है:
“सर्वर डाउन है या सॉफ्टवेयर काम नहीं कर रहा”: तकनीकी खामियों को ढाल बनाकर कई अस्पताल आयुष्मान मरीजों को भर्ती करने से बचते हैं।
“बेड खाली नहीं है”: हकीकत यह है कि अस्पताल उन बेड्स को कैश देने वाले मरीजों के लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं।
पैकेज की कम दरें: प्राइवेट अस्पतालों का तर्क है कि सरकार द्वारा तय की गई सर्जरी की दरें बहुत कम हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली के एक मामले में सामने आया कि हिप रिप्लेसमेंट के लिए आयुष्मान के तहत 80,000 रुपये मिलते हैं, जबकि अच्छे इम्प्लांट की कीमत ही 70,000 रुपये है। ऐसे में अस्पताल मरीज से ऊपर से पैसे मांगते हैं।
मशीनें हैं पर ऑपरेटर नहीं: एक बड़ा बुनियादी संकट
ग्राउंड रिपोर्ट दिखाती है कि कई जिला अस्पतालों में ‘पीएम केयर फंड’ और अन्य योजनाओं से वेंटिलेटर तो पहुँच गए हैं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए क्रिटिकल केयर ऑपरेटर या प्रशिक्षित डॉक्टर ही नहीं हैं। आलम यह है कि करोड़ों की मशीनें कमरों में धूल फांक रही हैं और मरीज को बड़े शहर के लिए रेफर कर दिया जाता है, जहाँ पहुँचने से पहले ही उसकी मौत हो जाती है।
आज भी 45% खर्च अपनी जेब से
दावा ‘कैशलेस’ इलाज का है, लेकिन हकीकत में गरीब को आज भी दवाइयों, जांचों और अस्पताल तक पहुँचने के लिए कर्ज लेना पड़ता है। भारत में आज भी स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 45% हिस्सा आम आदमी को अपनी जेब से देना पड़ रहा है।
सिस्टम बनाम हकीकत: असली विलेन कौन?
समस्या सिर्फ नियत की नहीं, बल्कि क्रियान्वयन (Implementation) की है।
प्राइवेट अस्पतालों का बकाया: कई निजी अस्पतालों का करोड़ों रुपया सरकार के पास लंबित है, जिससे वे इस योजना के तहत इलाज करने में कतराते हैं।
स्टाफ की कमी: सरकारी डॉक्टरों का वेतन कम होने के कारण वे निजी प्रैक्टिस की ओर भाग रहे हैं।
जवाबदेही का अभाव: अगर कोई अस्पताल कार्ड होने पर इलाज मना करे, तो शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal) इतना सुस्त है कि न्याय मिलने तक मरीज ही नहीं बचता।
निष्कर्ष: कार्ड से ज्यादा काबिलियत की जरूरत
सिर्फ कार्ड बांटने से स्वास्थ्य क्रांति नहीं आएगी। जब तक हम अस्पतालों में डॉक्टरों की संख्या नहीं बढ़ाएंगे, वेंटिलेटर ऑपरेटरों की भर्ती नहीं करेंगे और प्राइवेट अस्पतालों के साथ दरों पर पारदर्शिता नहीं लाएंगे, तब तक आयुष्मान कार्ड महज एक ‘प्लास्टिक का टुकड़ा’ बना रहेगा।
क्या हम एक ऐसा सिस्टम बना पाएंगे जहाँ गरीब को इलाज के लिए सिफारिश या गिड़गिड़ाने की जरूरत न पड़े? यह सवाल आज भी अस्पताल के गलियारों में गूँज रहा है।
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