Jharkhand illegal medical shops : झारखंड में ग्राम पंचायत स्तर पर बिना पंजीकृत फार्मासिस्ट के संचालित हो रही दवा दुकानों के मामले में झारखंड उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा मानते हुए राज्य सरकार सहित संबंधित संस्थाओं से स्पष्ट और विस्तृत जवाब मांगा है।
यह मामला W.P.(C) No. 220 of 2026 के तहत दायर याचिका से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में दवा दुकानें बिना योग्य फार्मासिस्ट के संचालित हो रही हैं। यह स्थिति फार्मेसी अधिनियम 1948 के प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है और इससे आम लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने पूर्व में दाखिल हलफनामों पर असंतोष जताया। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल औपचारिक जवाब देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सभी बिंदुओं पर ठोस और तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत करनी होगी।
कोर्ट ने झारखंड सरकार के स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया है कि वे स्वयं इस मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। अदालत ने यह भी कहा कि इस स्तर के मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा जिम्मेदारी से बचना स्वीकार्य नहीं है।
इसके साथ ही अदालत ने फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया, ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया, झारखंड ड्रग कंट्रोलर तथा अन्य संबंधित पक्षों को भी अपने-अपने पक्ष में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने सख्त समयसीमा निर्धारित करते हुए सभी प्रतिवादियों को 17 अप्रैल 2026 तक काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का आदेश दिया है। वहीं याचिकाकर्ताओं को 30 अप्रैल 2026 तक प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दी गई है। इस मामले की अगली सुनवाई 7 मई 2026 को निर्धारित की गई है।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस याचिका में स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव, फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया के रजिस्ट्रार, ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया, झारखंड ड्रग कंट्रोलर, पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त और सिविल सर्जन सहित कई अहम अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला राज्य में दवा वितरण व्यवस्था की पारदर्शिता और गुणवत्ता से सीधे जुड़ा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में बिना प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा दवा वितरण से गलत दवाइयों का उपयोग, डोज की त्रुटियां और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं।
यदि न्यायालय इस मामले में सख्त दिशा-निर्देश जारी करता है, तो झारखंड में दवा दुकानों के संचालन को लेकर बड़े स्तर पर बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इससे न केवल कानून का सख्ती से पालन सुनिश्चित होगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में भी सुधार होने की उम्मीद है।
फिलहाल पूरे राज्य की नजरें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि झारखंड में फार्मेसी संचालन के नियमों को लेकर आगे की दिशा क्या होगी।



