Prashant Bose Death : प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) के वरिष्ठ नेता और पोलित ब्यूरो सदस्य प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ का शुक्रवार तड़के निधन हो गया। उन्होंने सुबह करीब 4 बजे बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और उम्र भी 75 वर्ष से अधिक हो चुकी थी।
जेल प्रशासन ने नियमानुसार उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए रिम्स भेज दिया है। इस घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया है।
नक्सल आंदोलन का बड़ा चेहरा था ‘किशन दा’
प्रशांत बोस नक्सल आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। संगठन के महासचिव नंबला केशव राव के बाद उन्हें दूसरा सबसे ताकतवर नेता माना जाता था।
वे लंबे समय तक संगठन की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में सक्रिय रहे और कई बड़े रणनीतिक फैसलों में उनकी अहम भूमिका रही।

पश्चिम बंगाल से झारखंड तक का सफर
प्रशांत बोस मूल रूप से पश्चिम बंगाल के निवासी थे। उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) से जुड़कर नक्सल गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की।
साल 2004 में जब MCCI और पीपुल्स वार ग्रुप का विलय हुआ और नया संगठन भाकपा (माओवादी) बना, तब बोस को सीधे पोलित ब्यूरो में शामिल किया गया। इसके बाद वे संगठन के शीर्ष नेतृत्व में शामिल हो गए।
एक करोड़ का इनामी था ‘किशन दा’
प्रशांत बोस पर सुरक्षा एजेंसियों ने एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया था। यह इनाम उनकी संगठन में ऊंची हैसियत और सक्रियता को दर्शाता था।
उन्हें 12 नवंबर 2021 को झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले से उनकी पत्नी शीला मरांडी के साथ गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद से ही वे जेल में बंद थे।
सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर
प्रशांत बोस की मौत के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। माना जा रहा है कि संगठन के अंदर नेतृत्व को लेकर हलचल बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी मौत से माओवादी संगठन को रणनीतिक और नेतृत्व स्तर पर बड़ा झटका लग सकता है, क्योंकि वे लंबे समय से नीति निर्धारण में अहम भूमिका निभा रहे थे।
क्या पड़ेगा असर?
- संगठन में नेतृत्व का संकट गहरा सकता है
- रणनीतिक फैसलों पर असर पड़ने की संभावना
- झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में गतिविधियों पर प्रभाव
- नए नेतृत्व को लेकर अंदरूनी खींचतान बढ़ सकती है
प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ की मौत नक्सल आंदोलन के लिए एक बड़े युग के अंत के रूप में देखी जा रही है। वे दशकों तक संगठन की रीढ़ बने रहे और उनकी रणनीतिक सोच ने कई राज्यों में माओवादी गतिविधियों को प्रभावित किया।
उनके निधन के बाद अब सभी की नजर इस बात पर है कि संगठन में अगला नेतृत्व कौन संभालेगा और इसका देश की आंतरिक सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा।



