West Singhbhum Blood Donation Day : पश्चिमी सिंहभूम जिले के प्रशासनिक इतिहास में 24 अप्रैल 2026 की तारीख एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। जिले के नवपदस्थापित उपायुक्त (DC) श्री मनीष कुमार (I.A.S.) ने कार्यभार संभालने के साथ ही न केवल विकास की फाइलों पर हस्ताक्षर किए, बल्कि जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था और मानवीय संवेदनाओं को एक नया जीवनदान दिया है। उनकी इस दूरदर्शी सोच का परिणाम है कि अब पूरे जिले में हर महीने की 24 तारीख को “रक्तदान दिवस” के रूप में मनाया जाएगा।
पहले ही दिन दिखा जबरदस्त उत्साह
उपायुक्त की इस घोषणा का असर जमीन पर भी उतनी ही तेजी से दिखा। 24 अप्रैल को जिले के 6 अलग-अलग स्वास्थ्य केंद्रों में रक्तदान शिविरों का आयोजन किया गया। आंकड़ों की बात करें तो पहले ही दिन कुल 252 यूनिट रक्त का संग्रह हुआ, जो किसी भी जिला स्तरीय मुहिम के शुरुआती चरण के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। यह महज एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन बनता दिख रहा है।
भारत के प्रशासनिक इतिहास में संभवतः पहली शुरुआत
समाजसेवी गुरमुख सिंह खोखर ने इस पहल की सराहना करते हुए उपायुक्त से व्यक्तिगत मुलाकात की। उन्होंने कहा कि संभवतः भारत के किसी भी जिले में किसी उपायुक्त द्वारा हर महीने की एक निश्चित तिथि को ‘रक्तदान दिवस’ के रूप में संस्थागत रूप देना अपने आप में पहली और अनूठी शुरुआत है। श्री खोखर ने उपायुक्त को सौंपे गए मांग पत्र में इस ऐतिहासिक कदम को ‘मील का पत्थर’ बताया और इसके निरंतर जारी रहने की आशा व्यक्त की।
क्यों खास है यह पहल?
अमूमन जिलों में रक्त की कमी होने पर आपातकालीन शिविर लगाए जाते हैं, लेकिन हर महीने की 24 तारीख को इसे एक ‘कैलेंडर इवेंट’ बना देने से:
जिले के ब्लड बैंकों में रक्त की कमी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी।
थैलेसीमिया और एनीमिया से पीड़ित मरीजों को समय पर सहायता मिल सकेगी।
युवाओं में स्वैच्छिक रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
प्रशासनिक संवेदनशीलता की नई परिभाषा
उपायुक्त मनीष कुमार ने स्वयं इस मुहिम की शुरुआत कर यह संदेश दिया है कि प्रशासन केवल दफ्तरों से नहीं, बल्कि जनता की रगों में दौड़ने वाली जिंदगी की सुरक्षा से भी जुड़ता है। जिले के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने इस पुनीत कार्य के लिए उपायुक्त का आभार व्यक्त किया है।
पश्चिमी सिंहभूम की यह ‘रेड रिवोल्यूशन’ (लाल क्रांति) आने वाले समय में पूरे झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के अन्य जिलों के लिए भी एक रोल मॉडल साबित हो सकती है।



