विदेशी मीडिया के ‘कचरा’ वाले दावों पर भारत का करारा जवाब! 22 हज़ार करोड़ की इंडस्ट्री की असली सच्चाई
AKM NEWS : हाल ही में कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में हरियाणा के पानीपत सहित भारत के टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग (कपड़ा पुनर्चक्रण) हब को लेकर कई भ्रामक दावे किए गए थे। इन रिपोर्ट्स में भारत के कपड़ा उद्योग को पर्यावरण के लिए खतरनाक और पश्चिमी देशों के ‘फास्ट फैशन’ (Fast Fashion) कचरे का डंपिंग ग्राउंड बताने की कोशिश की गई।
लेकिन अब, भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय (Ministry of Textiles) ने इन दावों की धज्जियां उड़ाते हुए विदेशी मीडिया को आईना दिखाया है। सरकार ने साफ किया है कि भारत डंपिंग ग्राउंड नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े और सबसे एडवांस टेक्सटाइल रिकवरी और रीसाइक्लिंग नेटवर्क का बॉस है।
आइए तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर समझते हैं कि कैसे भारत कचरे से कंचन बना रहा है और विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स कितनी भ्रामक हैं।
‘डंपिंग ग्राउंड’ का दावा पूरी तरह झूठ
विदेशी मीडिया का सबसे बड़ा आरोप था कि पश्चिमी देशों के पुराने और इस्तेमाल किए गए कपड़े भारत में फेंके जा रहे हैं। लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।
- सिर्फ 7% है विदेशी कचरा: मंत्रालय की “मैपिंग ऑफ टेक्सटाइल वेस्ट वैल्यू चेन इन इंडिया” रिपोर्ट के अनुसार, भारत सालाना लगभग 7.8 मिलियन टन टेक्सटाइल वेस्ट मैनेज करता है। इसमें से 90% से अधिक कचरा घरेलू (फैक्ट्री स्क्रैप और पोस्ट-कंज्यूमर) होता है।
- आयातित कचरा कुल मात्रा का मात्र 7% है, जिसे ‘खतरनाक और अन्य अपशिष्ट नियम, 2016’ के तहत सख्ती से नियंत्रित किया जाता है।
- यानी भारत अपनी जरूरत और अपनी इंडस्ट्री को चलाने के लिए रीसाइक्लिंग कर रहा है, न कि दूसरों का कचरा ढोने के लिए।
कचरा नहीं, ₹22,000 करोड़ की ‘गोल्डमाइन’
जिसे विदेशी मीडिया कचरा बता रहा है, वह असल में भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। फिक्की (FICCI) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का टेक्सटाइल वेस्ट इकोसिस्टम सालाना लगभग ₹22,000 करोड़ का आर्थिक मूल्य (Economic Value) पैदा करता है।
भारत में कपड़े बनाने के दौरान निकलने वाले कचरे (प्री-कंज्यूमर वेस्ट) का लगभग 97% वापस रीसायकल कर लिया जाता है। यह आंकड़ा साबित करता है कि ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ (Circular Economy) का कॉन्सेप्ट भारत के रग-रग में बसा है। हमारे यहां कपड़ों को तब तक इस्तेमाल किया जाता है, जब तक कि वह पोछा न बन जाए!
पर्यावरण का दुश्मन नहीं, रक्षक है ‘पानीपत मॉडल’
विदेशी रिपोर्ट्स में हरियाणा के पानीपत क्लस्टर को प्रदूषण का कारण बताया गया। इसके जवाब में सरकार ने IIT दिल्ली की एक सख्त लाइफ साइकिल असेसमेंट (LCA) स्टडी का हवाला दिया है।
इस स्टडी के लिए डेटा सीधे पानीपत क्लस्टर से लिया गया था। रिसर्च में सामने आया कि वर्जिन फाइबर (नया धागा) बनाने की तुलना में, पानीपत में हो रही रीसाइक्लिंग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन की कमी जैसे पर्यावरणीय प्रभावों में 30-40% की कमी आती है। आसान भाषा में कहें तो पानीपत की फैक्ट्रियां पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचा रही हैं, बल्कि उसे बचा रही हैं।
बुलेटप्रूफ जैकेट तक को रीसायकल कर रहा है भारत
भारत का टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग सिर्फ पुराने टी-शर्ट या स्वेटर तक सीमित नहीं है। भारत हाई-वैल्यू टेक्निकल टेक्सटाइल को भी रीसायकल करने में महारत हासिल कर रहा है।
- डिफेंस ग्रेड फाइबर: IIT दिल्ली द्वारा पानीपत में स्थापित ‘अटल सेंटर ऑफ टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग एंड सस्टेनेबिलिटी (ACTRS)’ ने एक ऐसा कमाल किया है जो दुनिया में पहली बार हुआ है।
- यहां बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट और बख्तरबंद वाहनों में इस्तेमाल होने वाले बेहद मजबूत ‘अरामिड फाइबर’ (Aramid fibre) के कचरे को रीसायकल करने की तकनीक विकसित की गई है। दुनिया भर में ऐसे कचरे को जला दिया जाता है या जमीन में गाड़ दिया जाता है, लेकिन भारत इसे दोबारा इस्तेमाल लायक बना रहा है।
तिरुपुर का ‘जीरो-लिक्विड डिस्चार्ज’ बना ग्लोबल मिसाल
यह सच है कि किसी भी बड़ी औद्योगिक व्यवस्था में कुछ कमियां हो सकती हैं। छोटे और असंगठित कारखानों में पर्यावरण मानकों को लेकर चुनौतियां हैं। लेकिन सरकार इन पर आंखें मूंद कर नहीं बैठी है।
- सख्त कार्रवाई: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड लगातार गैर-अनुपालन वाली इकाइयों पर कार्रवाई कर रहे हैं।
- ZLD सिस्टम: तमिलनाडु के तिरुपुर क्लस्टर ने दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की है। वहां की रंगाई (Dyeing) और प्रोसेसिंग इकाइयों में ‘जीरो-लिक्विड डिस्चार्ज’ (ZLD) सिस्टम लागू है, जिसका मतलब है कि प्रदूषित पानी की एक भी बूंद बाहर नहीं जाती।
- मजदूरों की सुरक्षा: सरकार ने ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ (OSH) कोड, 2020 और वेज कोड लागू किए हैं ताकि कामगारों की सुरक्षा और उनका वेतन सुनिश्चित किया जा सके।
निष्कर्ष: आधा सच दिखा रहा है विदेशी मीडिया
इसमें कोई शक नहीं कि कुछ छिटपुट मामले या छोटी फैक्ट्रियां नियमों का उल्लंघन कर सकती हैं, लेकिन इसे पूरे भारत के टेक्सटाइल सेक्टर का ‘स्ट्रक्चरल शोषण’ या ‘पर्यावरणीय लापरवाही’ बताना पूरी तरह भ्रामक और सिलेक्टिव पत्रकारिता है।
भारत की टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री न केवल लाखों लोगों को रोजगार दे रही है, बल्कि आधुनिक तकनीक अपनाकर दुनिया के लिए एक उदाहरण भी पेश कर रही है। सरकार का लक्ष्य स्पष्ट है— एक ऐसा कपड़ा उद्योग जो पर्यावरण के अनुकूल हो, सामाजिक रूप से समावेशी हो और ग्लोबल मार्केट में भारत का दबदबा कायम रखे।
आपका क्या सोचना है? क्या आपको भी लगता है कि भारत की रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री को लेकर विदेशी मीडिया का रवैया पक्षपाती है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं!





