Gouranga Dutta social worker : झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले से मानवता और संवेदनशीलता की एक मिसाल सामने आई है, जहां एक समाजसेवी की पहल ने तीन मासूम बच्चों की जिंदगी को अंधेरे से निकालकर उम्मीद की रोशनी में ला खड़ा किया।
ईचागढ़ प्रखंड के टीकर पंचायत अंतर्गत ग्राम टीकर पामिया-टोला कुलटांड़ के तीन बच्चे—मनीषा मुर्मू, लक्ष्मी मुर्मू और ईश्वर मुर्मू—बीते कुछ ही समय में अपने माता-पिता को खोकर पूरी तरह अनाथ हो गए थे। पिछले वर्ष पिता की मृत्यु के बाद किसी तरह जीवन चल रहा था, लेकिन हाल ही में माँ के निधन ने इन बच्चों को बेसहारा कर दिया।
इसी संवेदनशील स्थिति को देखते हुए समाजसेवी गौरांग दत्ता ने सोशल मीडिया के माध्यम से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और जिला प्रशासन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया।अपने भावुक संदेश में उन्होंने इन बच्चों की पीड़ा को साझा करते हुए मदद की अपील की। उनकी इस पहल ने प्रशासन को तुरंत सक्रिय कर दिया। गौरांग दत्ता की यही मानवीय संवेदना और तत्परता उन्हें समाज के सच्चे नायक के रूप में स्थापित करती है। जब कई लोग केवल दर्शक बने रहते हैं, तब उन्होंने आगे बढ़कर इन मासूमों की आवाज बनने का साहस दिखाया।
मामले को संज्ञान में लेकर आवश्यक कार्रवाई की गई है।
एक बालिग बालिका (उम्र लगभग 21 वर्ष) का प्रखंड स्तरीय सिलाई प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षण हेतु नामांकन कराया जा रहा है। शेष दो बच्चों को स्पॉन्सरशिप योजना से जोड़ने तथा उनके विद्यालय में नामांकन की कार्रवाई की जा रही है। https://t.co/WUfXg7dToQ
— DC Seraikela-Kharsawan (@DCseraikella) April 24, 2026
DC की तत्परता, बच्चों को मिला सहारा
समाजसेवी की अपील पर संज्ञान लेते हुए जिला प्रशासन सरायकेला-खरसावां ने त्वरित कार्रवाई की।
डीसी कार्यालय के आधिकारिक बयान के अनुसार :
- बड़ी बालिका (लगभग 21 वर्ष) का नामांकन प्रखंड स्तरीय सिलाई प्रशिक्षण केंद्र में कराया जा रहा है, ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके।
- शेष दो छोटे बच्चों को स्पॉन्सरशिप योजना से जोड़ा जा रहा है।
- दोनों बच्चों के स्कूल में नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
यह कदम न केवल इन बच्चों के वर्तमान को सुरक्षित करेगा, बल्कि उनके भविष्य को भी दिशा देगा। यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि यदि समाज में संवेदनशील लोग सक्रिय रहें, तो किसी भी जरूरतमंद तक मदद पहुंच सकती है। गौरांग दत्ता ने केवल एक ट्वीट नहीं किया, बल्कि तीन जिंदगियों को नई दिशा देने का कार्य किया। उनकी इस पहल ने यह संदेश दिया कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े पद या संसाधनों की नहीं, बल्कि एक सच्चे दिल और पहल की जरूरत होती है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद स्थानीय लोगों में खुशी की लहर है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर गौरांग दत्ता जैसे समाजसेवी आगे आते रहें, तो कोई भी बच्चा बेसहारा नहीं रहेगा। लोगों ने प्रशासन की त्वरित कार्रवाई की भी सराहना की, लेकिन इस पहल का श्रेय सबसे पहले उस व्यक्ति को दिया जा रहा है जिसने आवाज उठाई—गौरांग दत्ता।
सरायकेला की यह घटना केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है—एक ऐसी कहानी जिसमें एक समाजसेवी की पहल, प्रशासन की संवेदनशीलता और मानवता की जीत दिखाई देती है। आज ये तीन बच्चे अकेले नहीं हैं, क्योंकि उनके साथ खड़ा है पूरा समाज—और उस समाज का चेहरा बने हैं गौरांग दत्ता।






